भारत अभी भी कोरोना वायरस संक्रामण लड़ रहा है और हमारे देश के चिकित्सक न केवल इस घातक वायरस के बारे में चिंतित है बल्कि रोगियों द्वारा बताई जा रही अन्य उपद्रव स्वरूप जटिलताओं के बारे में भी चिंतित है।
COVID-19 से ठीक होने वाले लोगों में एक घातक जटिलता भारत में देखी गई जिसमें कोरोना पॉज़िटिव लोग एक कवक रोग म्यूकोर्मिकोसिस (जिसे पहले जाइगोमाइकोसिस कहा जाता था) ब्लैक फंगल इंफेक्शन या काला कवक से रोग से पीड़ित पाये गए।
हालांकि यह रोग दुर्लभ है लेकिन आजकल कुछ कोरोना संक्रमित लोगों में पाया गया है।
ब्लैक फंगस क्या है What is Black Fungus in hindi?
म्यूकोर्मिकोसिस अथवा ब्लैक फंगस एक तरह का फंगल (कवक) इंफेक्शन है, जिसको काली फफूंद भी कहते हें। जो म्यूकर मोल्ड्स के संपर्क में आने के कारण होता है। ब्लैक फ़ंगस मिट्टी, पत्तियों, सीलन, सड़ी लकड़ी,फलों और सब्जियों और सड़ी हुई खाद आदि में अधिक पैमाने पर पाया जाता है, जहां से इसके संक्रमण का खतरा अधिक होता है।
यह साइनस को संक्रमित करता है और इंट्राऑर्बिटल और इंट्राक्रैनियल क्षेत्रों में अपना रास्ता बनाता है। इसके साथ-साथ आँख, नाक,जबड़े, फेफड़े व मस्तिष्क को संक्रमित करता है।
ब्लैक फंगस इंफेक्शन के शुरुआती लक्षण आंखों और नाक के पास लालिमा (redness) व दर्द होता है। साथ ही नाक बंद होना, बुख़ार और नाक व खांसी में खून आ सकता है।
यदि इसका इलाज समय पर नहीं किया गया, तो 50-80% रोगियों की मृत्यु हो सकती है। इस बीमारी में आंख या जबड़े में इंफेक्शन होता है, जिसके बढ़ने पर मरीज की जान जा सकती है।
यदि कोरोना संक्रमित रोगियों यदि इस प्रकार के लक्षण दिखे तो इन चेतावनी संकेतों की शीघ्रता से जांच करानी आवश्यक है। उपयुक्त चिकित्सक से सलाह लेकर कवक इंफेक्शन टेस्ट करवाना चाहिए ताकि संक्रमण का प्रभावी इलाज किया जा सके।
ब्लैक फंगस संक्रमण कैसे फैलता है? How does Black Fungal infection spread in Hindi
ब्लैक फ़ंगस मिट्टी, पत्तियों, सीलन, सड़ी लकड़ी और सड़ी हुई खाद आदि में अधिक पैमाने पर पाया जाता है, जहां से कवक बीजाणुओं के संपर्क में आने से इसके संक्रमण का खतरा अधिक होता है।
आजकल अस्पताल में होने वाली प्रयुक्त होने वाले गैर-विसंक्रमित उपकरण, गंदी पट्टियाँ, अस्वच्छ चादर, प्रदूषित वायु में सांस लेने के कारण इस कवक के फैलने का खतरा अधिक होता है।
घर पर भी पुराने एयर कंडीशनर व कूलर, गंदे व सीलन युक्त कमरे, गंदे कपड़े व चादरें, घाव को ढकने हेतु प्रयुक्त गंदी पट्टियाँ, पुरानी लकड़ी, मिट्टी, बंद कमरों में वायु का उचित आदान प्रदान न होना व बरसात का मौसम आदि से यह संकर्मण फैलता है ।
ब्लैक फंगस के माध्यम से त्वचा में संक्रमण हो सकता है, जो त्वचा पर खरोंच, जलन या अन्य प्रकार की त्वचा की चोट के माध्यम से प्रवेश करता है।
जब म्यूकर साइनस पर हमला करता है, तो यह फेफड़ों, मस्तिष्क सहित केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में फैल जाता है। परिणामस्वरूप म्यूकोर्मिकोसिस के सामान्य लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, नाक या आंखों के पास लालिमा, त्वचा में सूजन,चेहरे का दर्द, खांसी में खून, या गहरे रंग का तरल पदार्थ और सांस लेने में तकलीफ शामिल हैं।
चिकित्सक ऊतक बायोप्सी और फेफड़ों के एक्स-रे के माध्यम से इसकी जाँच कर सकते हैं।ब्लैक फंगल इंफेक्शन के लक्षण
Black fungus symptoms in hindi
- आंखों और नाक के पास लालिमा का होना
- चेहरे का दर्द व एक तरफा सूजन होना
- बुखार, सिरदर्द, खांसी, जबडों की हड्डी में दर्द व धुंधला दिखाई देना
- सांस लेने में तकलीफ या सीने में दर्द होना
- खून भरी उल्टी या गहरे रंग का तरल पदार्थ उत्सर्जित होना
- मानसिक स्थिति में बदलाव आदि ब्लैक फंगल इंफेक्शन के लक्षण पाये गए हें।
ब्लैक फंगस के अधिक जोखिम में कौन है? Who is at greater risk of Mucormycosis in Hindi
ब्लैक फंगस दुर्लभ है, लेकिन यह उन लोगों में अधिक आम है जिन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं या जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमजोर है। हालांकि यह रोग दुर्लभ है लेकिन आजकल कुछ कोरोना संक्रमित लोगों में पाया जा रहा है।
कोरोना वाइरस एचआईवी/एड्स और अन्य वायरल बीमारियों, जन्मजात अस्थि मज्जा रोग, गंभीर जलन, कैंसर, अंग प्रत्यारोपण, स्टेम सेल प्रत्यारोपण और अनुपचारित मधुमेह (विशेष रूप से कीटोएसिडोसिस के साथ) से पीड़ित लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। जिससे उनमें म्यूकोर्मिकोसिस होने का खतरा अधिक होता है।
स्टेरॉयड लेने वाले कोरोना संक्रमित रोगियों को विशेष रूप से खतरा होता है क्योंकि स्टेरॉयड प्रतिरक्षा प्रणाली की गतिविधि को कम करते हैं। यही कारण है कि स्टेरॉयड का उपयोग तब तक नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि बिल्कुल आवश्यक न हो।
ब्लैक फंगस का खतरा कब होता है When is there a risk of Black Fungus in hindi?
- कोरोना के बाद न्यूट्रोपीनिया (खून में न्यूट्रोफिल रक्त कणिकाओं की कमी) होजाने के कारण
- शरीर में बहुत अधिक आयरन की अधिकता (Hemochromatosis) होने से
- लंबे समय तक अधिक मात्रा में कॉर्टिकोस्टेरॉइड का उपयोग करने से
- सर्जरी, जलने या घाव के कारण त्वचा की चोट जो लंबे समय से ठीक न हुई हो
ब्लैक फंगस से कैसे बचें? Black fungus prevention guidelines in Hindi
- अगर आपको कोरोना संक्रमण तो ब्लैक फ़ंगस के लक्षण दिखने पर फंगल इन्फेक्शन टेस्ट जरूर कराएं।
- कोरोना संक्रमण के इलाज और अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी ब्लड शुगर लेवल की जांच करते रहें।
- शुगर को कंट्रोल में रखें व रक्त शर्करा के स्तर की जांच करते रहें ।
- अनावश्यक स्टीरॉयड्स का सेवन ना करें अथवा चिकित्सक की सल्राह से ही लें।
- ऑक्सीजन थेरेपी के दौरान स्वच्छ और स्टेराइल किए गये पानी को प्रयोग में लाएं |
- एंटीबायोटिक्स और एंटीफंगल दवाइयों का सावधानी से इस्तेमाल करें।
- निर्माण या उत्खनन वाले क्षेत्रों से बचने की कोशिश करें।
- क्षतिग्रस्त इमारतों, तूफान और प्राकतिक आपदाओं व बाढ़ के पानी के सीधे संपर्क से बचे।
- धूल, मिट्टी व प्रदूषित वातावरण मे जाने पर फेस मास्क पहनें।
- व्यक्तिगत स्वच्छता सुनिश्चित करें व त्वचा के संक्रमण के विकास की संभावना को कम करने के लिए, त्वचा की चोटों को साबुन और पानी से अच्छी तरह साफ करें, खासकर अगर वे मिट्टी या धूल के संपर्क में हों।
ब्लैक फंगस की चिकित्सा कैसे की जाती है?
- चिकित्सक द्वारा कवक इंफेक्शन टेस्ट में Mucormycosis की पुष्टि हो जाने के बाद, तत्काल उपचार के रूप में एंटीफंगल दवाओं का प्रयोग किया जाता है।
- Mucormycosis के इलाज में सबसे प्रभावी दो दवाएं Amphotericin B और Posaconazole या Isavuconazole शामिल हैं।
- कोरोना पॉजिटिव रोगी के ठीक होने के पश्चात भी मधुमेह से पीड़ित व्यक्तियों में रक्त शर्करा के स्तर की जांच करने की सलाह दी जाती है। और रक्त शर्करा की रीडिंग में अचानक वृद्धि होने पर तुरंत चिकित्सा परामर्श लें ।
- कुछ परिस्थितियों में जहां शारीरिक ऊतकों में गंभीर क्षति हुई है, ब्लॅक फंगस को हटाने के लिए शल्य चिकित्सा की जाती है।
- संक्रमण के विकास की संभावना को कम करने के लिए अपनी स्वच्छता बनाए रखने की सलाह दी जाती है ।
ब्लैक फंगस आयुर्वेदिक चिकित्सा दृष्टिकोण
कोविड रोगियों में घातक काले कवक जटिलताओं के प्रसार के मद्देनजर, आयुष मंत्रालय ने भी गंभीर रूप से बीमार रोगियों को उपचार प्रदान करने के लिए विशेष चिकित्सा प्रोटोकॉल विकसित किए हैं।
जिसमें काले कवक के कारण उच्च जोखिम वाले रोगियों की सहायता के लिए निवारक आयुर्वेद चिकित्सा के उपयोग का प्रस्ताव है । उपचार में कुछ आयुर्वेद दवाओं को शामिल करने से व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने और बीमारी से लड़ने में मदद मिलेगी । इसके साथ ही विशिष्ट भोजन और सुरक्षात्मक देखभाल की भी आवश्यकता होगी।
आयुष मंत्रालय ने कहा कि आयुर्वेदिक दवाएं रुग्णता और मृत्यु दर को कम करने के अलावा ब्लैक फंगस के मामलों को जल्दी ठीक करने में मदद कर सकती हैं।
फंगल संक्रमण के लिए आयुवर्दिक औषधियाँ Ayurvedic medicines for fungal infection in hindi
- माणिक्यरस
- दद्रुघ्न वटी
- चंद्रप्रभा वटी
- आरोग्यवर्धिनी वटी
- गिलोय घन बटी
- अणु तैल नस्य
- फलत्रिकादी काढ़ा
- कैशोर गुग्गुल और गंधक रसायन
कुछ आयुर्वेदिक जड़ीबूटियाँ जेसे- लहसुन, अदरक, हल्दी, यष्टिमधु, वासा (अडूसा), त्रिफला, नीम, गुडूची, अश्वगंधा, तुलसी आदि में फंगल रोधी तत्व होते हें, जो रक्त को शुद्ध करने के साथ-साथ त्वचा के संक्रमण को कम करने करने में मदद करती हें।
आयुर्वेद में फंगल संक्रमण के इलाज में इनका प्रयोग किया जाता है । इनका उपयोग घर पर भी काढ़े, रस, लेप आदि रूप में किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त फंगल संक्रमण को दूर करने के लिए आयुर्वेद में वमन कर्म किया जाता है।
ब्लैक फंगस उपचार के लिए नस्य Nasya for Black fungus treatment in Hindi
ब्लैक फंगस मुख्य रूप नासा मार्ग, आंख, व मस्तिष्क को मुख्य रूपसे संक्रमित करता है। आयुर्वेद में सभी प्रकार के शिरोरोग में नस्य एक प्रभावी इलाज है। नस्य का अर्थ होता है,नाक में दी जाने वाली औषधि यह हमारे नासा मार्ग को शुद्ध व मजबूत बनाता है। इसके साथ-साथ यह हमें इम्यूनिटी भी प्रदान करता है। नाक में अणु तैल या तिल तैल नस्य की 2-2 बूंद प्रतिदिन ब्लैक फंगस के इलाज में कारगर साबित हो सकती है।
रिसर्चगेट में एक लेख के अनुसार शोधकर्ताओं के द्वारा नस्य का उपयोग कोरोनावायरस में भी प्रभावी बताया गया है। आयुर्वेद में नस्य का उपयोग प्रति दिन करने का विधान है। इसे एक स्वस्थ व्यक्ति द्वारा भी लिया जा सकता है।
यह सभी प्रकार के सिरोरोग जैसे- आंख का रोग, सिरदर्द और माइग्रेन, साइनस का दर्द, गर्दन या जबड़े की कठोरता या दर्द, त्वचा रोग, चेहरे पर झुनझुनी, टौंसिल या गलसुओ की सूजन, लैरींगाइटिस, ग्रसनीशोथ, आदि में एक प्रभी इलाज है
ब्लैक फंगस उपचार के लिए जलौका चिकित्सा Ayurveda leech therapy for black fungus treatment in hindi
जोंक चिकित्सा या जलौकवचरण एक प्राचीन आयुर्वेदिक रक्तमोक्षण तकनीक है जिसमें कई शोथ और संक्रामक रोगों को ठीक करने की क्षमता है।
जलौकवचरण (जोंक चिकित्सा) का पहला विवरण 800 ई.पू. में लिखी गई सुश्रुत संहिता में मिलता है। हाल ही में, कई शोधों ने साबित किया है कि जोंक की लार में विभिन्न प्रकार के बायोएक्टिव यौगिक, जीवाणुरोधी और अन्य गुण होते हैं1Raval HN, Thakar AB. Role of Raktamokshana by Jalaukavacharana and Siravedhana in the management of Vicharchika (Eczema). Ayu. 2012;33(1):68-72. doi:10.4103/0974-8520.100314।
आयुर्वेद में रक्तमोक्षण के माध्यम से विभिन्न रोगों के इलाज के लिए जोंक चिकित्सा (जलौकावचरण) का उपयोग किया जाता है। इसमें प्रभावित जगह पर निर्विष जोंक रखा जाता है और उसके खून चूसने के बाद त्वचा नॉर्मल हो जाती है। जोंक केवल अशुद्ध रक्त चूसता है। तो, जोंक चिकित्सा को रक्त शोधन चिकित्सा माना जाता है।
जलौका २ तरह की होती है विषैली व निर्विष (विष रहित) आयुर्वेद में चिकित्सा के लिये निर्विष (विष रहित) जलौका का प्रयोग किया जाता है।
जोंक चिकित्सा या जलौकावचरण का उपयोग रक्त-प्रदोषज विकार (रक्त-जनित रोगों) जैसे – विदराधि (फोड़ा),आंखों में सूजन, शरीर में कहीं भी असामान्य वृद्धि, खून जमा होने पर, विसर्प (त्वचा संबंधी सूजन संबंधी विकार), गुलम (पेट की सूजन), पिडिका, कुष्ठ, चर्मदल (त्वचा रोग) आदि में किया जाता है।
हालाँकि ब्लैक फंगस यानी म्यूकोरमाइकोसिस के इलाज में आयुष मंत्रालय ने अभी तक जलौका चिकित्सा उपयोग करने की पुष्टि नहीं की है लेकिन ब्लैक फंगस या म्यूकोरमाइकोसिस एक त्वचा व रक्त-प्रदोषज विकार है इसलिए जलोका चिकित्सा ब्लैक फंगस के उपचार में प्रभावी साबित हो सकती है।
References
- 1Raval HN, Thakar AB. Role of Raktamokshana by Jalaukavacharana and Siravedhana in the management of Vicharchika (Eczema). Ayu. 2012;33(1):68-72. doi:10.4103/0974-8520.100314